(गोपाल मिश्रा) गरीबी से जूझते परिवार की तंगी दूर करने और बच्चों की अच्छी तालीम का सपना संजोये 4 साल पहले गांव से निकल कर दिल्ली पहुंचा। एक कपड़े की कटिंग करने वाले कंपनी में काम करने के बाद खुद की छोटी दुकानदारी शुरू की। हाथ ठेला खरीदा और मोहल्ले में घूमकर पार्चून का सामान बेचने लगा। धीरे-धीरे घर की स्थितियां संभलने लगी थी, लेकिन लॉकडाउन की मोर ने एक झटके में बस खाक कर दिया। रोजगार देने वाली लक्ष्मी हाथ ठेले का 6 हजार में बेंच कर मकान का किराया चुका दिया।
रास्ते के खर्च के लिए सोने वाली चौकी भी 400 रूपए में बेंच डाला। अब घर को खाली हाथ लौट रहे हैं। यह दर्द है पूर्णिया जिले के बैसा प्रखंड के चंदेल गांव के संदीप साह की। बलथरी चेकपोस्ट पर पहुंचे संदीप ने कहा कि- साहब सपने में भी नहीं सोचा था कि जीवन में लाचारी के ऐसे दिन भी देखने पड़ेंगे। यह पीड़ा केवल संदीप की ही नहीं बल्कि विनय गुप्ता और अमन गुप्ता की भी है।
दिल्ली के नरेला से पूर्णिया के लिए तीनों युवकों ने बताया कि आनंद विहार से वे बस द्वारा यहां पहुंचे । रास्ते में एक जगह बस खड़ी हुई थी। वहीं पर सरकारी राहत केन्द्र पर खाना खाए। रास्ते में भूख और प्यास को दबाए हुए यहां पहुंचे है। स्क्रीनिंग व रजिस्ट्रेशन कराने के बाद ट्रेन खुलने का इंतजार कर रहे हैं।
3827 प्रवासी हुए रवाना: शुक्रवार को बलथरी चेकपोस्ट से विभिन्न जिलों के लिए 3827 प्रवासियों का रजिस्ट्रेशन किया गया। इनमें से 745 लोगों को 20 बसों से उनके गृह जिले को भेजा गया।
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