(दीपक कुमार) सदियों से चल रहा पितरों के श्राद्ध का महापर्व ‘पितृपक्ष’ 2020 में ‘लॉक’ हो गया है। पहली बार मोक्ष भूमि गया में पितृपक्ष महासंगम नहीं होगा। बिहार सरकार ने कोरोना संक्रमण के कारण पितरों के महापर्व को स्थगित कर दिया है। पितृपक्ष मेला एक सितंबर से शुरू होना था। विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति सदस्य महेश लाल गुप्ता ने बताया कि 100 साल पहले अंग्रेजी हुकूमत में भी स्पेनिश फ्लू नाम की बीमारी ने पूरी दुनिया में कोहराम मचाया था। लेकिन उस वक्त पितृपक्ष महासंगम को नहीं रोका गया और न ही विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर का कपाट बंद हुआ। इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट तो बंद हुआ ही, पितृपक्ष मेला भी रोक दिया गया है। पिंडदान को रोकना धार्मिक स्वतंत्रता पर एक गहरी चोट है। गया घराने के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक राजन सिजुआर ने बताया कि 17 दिनी मेले में 100 से 150 कराेड़ का टर्न ओवर होता था। पंडा समाज, ब्राह्मण और छोटे-बड़े व्यवसायी छह माह से सालभर की कमाई इन 17 दिनों में कर लेते थे। मेला नहीं होने से स्थिति अब और भयावह होगी। आने वाले दिनों में निश्चित ही दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे। मेला रद्द करने के बजाए सरकार काे कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी। विरोध: परंपरा को सोशल डिस्टेंस के नाम पर रोकना बिल्कुल गलत विष्णुपद प्रबंधकारिणी के सदस्य शंभु लाल विट्ठल ने बताया कि सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर पितृपक्ष मेला रोकना पूरी तरह गलत है। बिहार सरकार और जिला प्रशासन को एक गाइड लाइन तैयार करनी चाहिए थी, ताकि जो भी पिंड-दानी अपने निजी वाहनों से आएं, वे श्रद्धा और आस्था के साथ कर्मकांड को पूरा कर सकें। सदियों से जो परंपरा चल रही है, उसे रोकना गलत है। इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट भी बंद है। मान्यता: जिस दिन परंपरा टूटी उस दिन जाग जाएगा गयासुर राक्षस गयासुर राक्षस द्वारा मांगे गए एक पिंड और एक मुंड की परंपरा सदियों से चल रही है। मान्यता है- जिस दिन यह परंपरा टूटी उस दिन राक्षस जाग जाएगा। इस साल लॉकडाउन के कारण विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर के कपाट बंद हो गए। तीर्थयात्रियों का आगमन भी रुक गया। स्थानीय पंडों ने मिलकर हर दिन पिंडदान की परंपरा को पूरा किया। बीच में मंदिर खुला तो पिंड-दानी पहुंचे भी। अब फिर कपाट बंद होने से पिंडदान की रस्में पंडाें द्वारा पूरी की जा रही हैं। सुविधा: ऑनलाइन श्राद्ध पर जोर; 17 से 20 हजार रुपए खर्च होंगे बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने पितृपक्ष मेला में ऑनलाइन श्राद्ध की शुरुआत की थी। कोरोना के कारण बिहार में 6 सितंबर तक लॉकडाउन है। इस कारण मेला स्थगित होने पर ऑनलाइन श्राद्ध पर जोर दिया जा रहा है। इस दौरान विष्णुपद, अक्षयवट, फल्गु नदी में श्राद्ध के कर्मकांड की रिकॉर्डिंग लोगों को भेजी जाएगी। इसमें करीब 17 से 20 हजार रु. के खर्च होते हैं। सामान्य दिनों में श्राद्ध का रेट 100 से 5001 रुपए तक होता है। पितृपक्ष के श्राद्ध का रेट: पितृपक्ष में पिंड-दानी विशेष कर पिंडदान के लिए गया पहुंचते हैं। इस दौरान वे 3 दिन, 7 दिन, 9 दिन, 15 दिन के साथ-साथ 17 दिन का कर्मकांड करते हैं। इस अवधि में हजारों रुपए तक पंडों को दान करते हैं। यानी श्राद्ध का कोई निश्चित रेट नहीं रहता। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट तो बंद हुआ ही, पितृपक्ष मेला भी रोक दिया गया है। पिंडदान को रोकना धार्मिक स्वतंत्रता पर एक गहरी चोट है।  - VTM Breaking News

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Friday, August 21, 2020

(दीपक कुमार) सदियों से चल रहा पितरों के श्राद्ध का महापर्व ‘पितृपक्ष’ 2020 में ‘लॉक’ हो गया है। पहली बार मोक्ष भूमि गया में पितृपक्ष महासंगम नहीं होगा। बिहार सरकार ने कोरोना संक्रमण के कारण पितरों के महापर्व को स्थगित कर दिया है। पितृपक्ष मेला एक सितंबर से शुरू होना था। विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति सदस्य महेश लाल गुप्ता ने बताया कि 100 साल पहले अंग्रेजी हुकूमत में भी स्पेनिश फ्लू नाम की बीमारी ने पूरी दुनिया में कोहराम मचाया था। लेकिन उस वक्त पितृपक्ष महासंगम को नहीं रोका गया और न ही विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर का कपाट बंद हुआ। इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट तो बंद हुआ ही, पितृपक्ष मेला भी रोक दिया गया है। पिंडदान को रोकना धार्मिक स्वतंत्रता पर एक गहरी चोट है। गया घराने के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक राजन सिजुआर ने बताया कि 17 दिनी मेले में 100 से 150 कराेड़ का टर्न ओवर होता था। पंडा समाज, ब्राह्मण और छोटे-बड़े व्यवसायी छह माह से सालभर की कमाई इन 17 दिनों में कर लेते थे। मेला नहीं होने से स्थिति अब और भयावह होगी। आने वाले दिनों में निश्चित ही दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे। मेला रद्द करने के बजाए सरकार काे कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी। विरोध: परंपरा को सोशल डिस्टेंस के नाम पर रोकना बिल्कुल गलत विष्णुपद प्रबंधकारिणी के सदस्य शंभु लाल विट्ठल ने बताया कि सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर पितृपक्ष मेला रोकना पूरी तरह गलत है। बिहार सरकार और जिला प्रशासन को एक गाइड लाइन तैयार करनी चाहिए थी, ताकि जो भी पिंड-दानी अपने निजी वाहनों से आएं, वे श्रद्धा और आस्था के साथ कर्मकांड को पूरा कर सकें। सदियों से जो परंपरा चल रही है, उसे रोकना गलत है। इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट भी बंद है। मान्यता: जिस दिन परंपरा टूटी उस दिन जाग जाएगा गयासुर राक्षस गयासुर राक्षस द्वारा मांगे गए एक पिंड और एक मुंड की परंपरा सदियों से चल रही है। मान्यता है- जिस दिन यह परंपरा टूटी उस दिन राक्षस जाग जाएगा। इस साल लॉकडाउन के कारण विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर के कपाट बंद हो गए। तीर्थयात्रियों का आगमन भी रुक गया। स्थानीय पंडों ने मिलकर हर दिन पिंडदान की परंपरा को पूरा किया। बीच में मंदिर खुला तो पिंड-दानी पहुंचे भी। अब फिर कपाट बंद होने से पिंडदान की रस्में पंडाें द्वारा पूरी की जा रही हैं। सुविधा: ऑनलाइन श्राद्ध पर जोर; 17 से 20 हजार रुपए खर्च होंगे बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने पितृपक्ष मेला में ऑनलाइन श्राद्ध की शुरुआत की थी। कोरोना के कारण बिहार में 6 सितंबर तक लॉकडाउन है। इस कारण मेला स्थगित होने पर ऑनलाइन श्राद्ध पर जोर दिया जा रहा है। इस दौरान विष्णुपद, अक्षयवट, फल्गु नदी में श्राद्ध के कर्मकांड की रिकॉर्डिंग लोगों को भेजी जाएगी। इसमें करीब 17 से 20 हजार रु. के खर्च होते हैं। सामान्य दिनों में श्राद्ध का रेट 100 से 5001 रुपए तक होता है। पितृपक्ष के श्राद्ध का रेट: पितृपक्ष में पिंड-दानी विशेष कर पिंडदान के लिए गया पहुंचते हैं। इस दौरान वे 3 दिन, 7 दिन, 9 दिन, 15 दिन के साथ-साथ 17 दिन का कर्मकांड करते हैं। इस अवधि में हजारों रुपए तक पंडों को दान करते हैं। यानी श्राद्ध का कोई निश्चित रेट नहीं रहता। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट तो बंद हुआ ही, पितृपक्ष मेला भी रोक दिया गया है। पिंडदान को रोकना धार्मिक स्वतंत्रता पर एक गहरी चोट है। 

(दीपक कुमार) सदियों से चल रहा पितरों के श्राद्ध का महापर्व ‘पितृपक्ष’ 2020 में ‘लॉक’ हो गया है। पहली बार मोक्ष भूमि गया में पितृपक्ष महासंगम नहीं होगा। बिहार सरकार ने कोरोना संक्रमण के कारण पितरों के महापर्व को स्थगित कर दिया है। पितृपक्ष मेला एक सितंबर से शुरू होना था।

विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति सदस्य महेश लाल गुप्ता ने बताया कि 100 साल पहले अंग्रेजी हुकूमत में भी स्पेनिश फ्लू नाम की बीमारी ने पूरी दुनिया में कोहराम मचाया था। लेकिन उस वक्त पितृपक्ष महासंगम को नहीं रोका गया और न ही विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर का कपाट बंद हुआ।

इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट तो बंद हुआ ही, पितृपक्ष मेला भी रोक दिया गया है। पिंडदान को रोकना धार्मिक स्वतंत्रता पर एक गहरी चोट है। गया घराने के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक राजन सिजुआर ने बताया कि 17 दिनी मेले में 100 से 150 कराेड़ का टर्न ओवर होता था।

पंडा समाज, ब्राह्मण और छोटे-बड़े व्यवसायी छह माह से सालभर की कमाई इन 17 दिनों में कर लेते थे। मेला नहीं होने से स्थिति अब और भयावह होगी। आने वाले दिनों में निश्चित ही दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे। मेला रद्द करने के बजाए सरकार काे कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी।

विरोध: परंपरा को सोशल डिस्टेंस के नाम पर रोकना बिल्कुल गलत

विष्णुपद प्रबंधकारिणी के सदस्य शंभु लाल विट्ठल ने बताया कि सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर पितृपक्ष मेला रोकना पूरी तरह गलत है। बिहार सरकार और जिला प्रशासन को एक गाइड लाइन तैयार करनी चाहिए थी, ताकि जो भी पिंड-दानी अपने निजी वाहनों से आएं, वे श्रद्धा और आस्था के साथ कर्मकांड को पूरा कर सकें। सदियों से जो परंपरा चल रही है, उसे रोकना गलत है। इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट भी बंद है।

मान्यता: जिस दिन परंपरा टूटी उस दिन जाग जाएगा गयासुर राक्षस

गयासुर राक्षस द्वारा मांगे गए एक पिंड और एक मुंड की परंपरा सदियों से चल रही है। मान्यता है- जिस दिन यह परंपरा टूटी उस दिन राक्षस जाग जाएगा। इस साल लॉकडाउन के कारण विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर के कपाट बंद हो गए। तीर्थयात्रियों का आगमन भी रुक गया। स्थानीय पंडों ने मिलकर हर दिन पिंडदान की परंपरा को पूरा किया। बीच में मंदिर खुला तो पिंड-दानी पहुंचे भी। अब फिर कपाट बंद होने से पिंडदान की रस्में पंडाें द्वारा पूरी की जा रही हैं।

सुविधा: ऑनलाइन श्राद्ध पर जोर; 17 से 20 हजार रुपए खर्च होंगे

बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने पितृपक्ष मेला में ऑनलाइन श्राद्ध की शुरुआत की थी। कोरोना के कारण बिहार में 6 सितंबर तक लॉकडाउन है। इस कारण मेला स्थगित होने पर ऑनलाइन श्राद्ध पर जोर दिया जा रहा है। इस दौरान विष्णुपद, अक्षयवट, फल्गु नदी में श्राद्ध के कर्मकांड की रिकॉर्डिंग लोगों को भेजी जाएगी। इसमें करीब 17 से 20 हजार रु. के खर्च होते हैं। सामान्य दिनों में श्राद्ध का रेट 100 से 5001 रुपए तक होता है।

पितृपक्ष के श्राद्ध का रेट: पितृपक्ष में पिंड-दानी विशेष कर पिंडदान के लिए गया पहुंचते हैं। इस दौरान वे 3 दिन, 7 दिन, 9 दिन, 15 दिन के साथ-साथ 17 दिन का कर्मकांड करते हैं। इस अवधि में हजारों रुपए तक पंडों को दान करते हैं। यानी श्राद्ध का कोई निश्चित रेट नहीं रहता।



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इतिहास में पहली बार विष्णुपद मंदिर का कपाट तो बंद हुआ ही, पितृपक्ष मेला भी रोक दिया गया है। पिंडदान को रोकना धार्मिक स्वतंत्रता पर एक गहरी चोट है। 


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